उडान टीवी सीरियल दूरदर्शन का समाज रुणी ही रह जायेगा

जैसे पैदा होना , मरना ....इन सब का एक दिन आता है वैसे ही सोचने वाले कि ज़िंदगी में ये दिन भी आता है जब वो पुछ बैठता है खुद से, आखिर कितना समय दिया मैंने अपनी ख्वाहिशों को और कितना आया मेरे समाज के हिस्से ....मौजुदा हालातों में सीधे राह पर चलने वालों कि कहानियों के अंत ये तो नहीं हो पायेंगे कि वो खुशी खुशी रहने लगे ....तो क्या हमारी आने वाली पीढियाँ  हमारी कहानियों के अंत इस तरह करेगी कि "और वो हार गया" या फ़िर "और वो झुझता रहा" .....और अगर एसे अंत होंगे तो फ़िर क्या आसमाँ खुद चलकर इस सरज़मीं पर ना बस जायेगा ??

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