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गुलपोश कहीं इतराये कहीं महके तो नज़र आ जाये कहीं तावीज़ बनाके पहनुँ उसे आयत की तरह मिल जाये कहीं वो यार है जो इमान मेरा मेरा नगमा वही , मेरा कलमा वही यार मिसाल-ए-ओस चले पाँवों के तले फ़िरदौस चले कभी डाल-डाल ,कभी पात​-पात मैं हवा पे ढूँढुं उसके निशाँ

हम फ़क्र से कहते हैं हम गा़लिब के वतन के बाशिंदे हैं

न  था  कुछ  तो  ख़ुदा  था  कुछ  न  हो ता  तो  ख़ुदा  होता  डुबोया  मुझ  को  होने  ने  न  होता  मैं   तो  क्या  होता  हुआ  जब  ग़म  से  यूँ  बे-हिस  तो  ग़ म  क्या  सर  के  कटने  का  न  होता  गर  जुदा  तन  से  तो  ज़ानू  पर  धरा  होता  हुई  मुद्दत  कि  'ग़ालिब'  मर  गया  पर  याद  आता  है  वो  हर  इक  बात  पर  कहना  कि  यूँ  हो ता  तो  क्या  होता                                                                          - ग़ालिब

कृष्ण की चेतावनी - रामधारी सिंह "दिनकर"

मैत्री की राह दिखाने को  सबको सुमार्ग पे लाने को  दुर्योधन को समझाने को  भीषण विध्वंस बचाने को   भगवान् हस्तिनापुर आये  पांडव का संदेसा लाये   "हो न्याय अगर तो आधा दो  और उसमे भी यदि बाधा हो  तो दे दो केवल पांच ग्राम  रखों अपनी धरती तमाम   जब नाश मनुज पर आता है पहले विवेक मर जाता हैं   भगवान् कुपित होकर बोले   "ज़ंजीर बढा अब साध मुझे  हाँ हाँ दुर्योधन बाँध मुझे  अमरत्व फूलता हैं मुझमे  संसार झूलता हैं मुझमे   दीप्ते  जो ग्रह नक्षत्र  निकर   सब हैं मेरे मुख के अन्दर   दृक हो तो दृश्य अखंड देख मुझमे सारा ब्रह्माण्ड देख  चराचर जीव जग क्षर-अक्षर  नश्वर मनुष्य सृजाती अमर   शत कोटि सूर्य शत कोटि चन्द्र  शत कोटि सरित्सर सिन्धु मंद्र   शत कोटि ब्रह्मा विष्णु महेश  शत कोटि जलपति जिष्णु धनेश    (जिष्णु - Jishnu - Victorious) शत कोटि रुद्र शत कोटि काल  शत...

उडान टीवी सीरियल दूरदर्शन का समाज रुणी ही रह जायेगा

जैसे पैदा होना , मरना ....इन सब का एक दिन आता है वैसे ही सोचने वाले कि ज़िंदगी में ये दिन भी आता है जब वो पुछ बैठता है खुद से, आखिर कितना समय दिया मैंने अपनी ख्वाहिशों को और कितना आया मेरे समाज के हिस्से ....मौजुदा हालातों में सीधे राह पर चलने वालों कि कहानियों के अंत ये तो नहीं हो पायेंगे कि वो खुशी खुशी रहने लगे ....तो क्या हमारी आने वाली पीढियाँ  हमारी कहानियों के अंत इस तरह करेगी कि "और वो हार गया" या फ़िर "और वो झुझता रहा" .....और अगर एसे अंत होंगे तो फ़िर क्या आसमाँ खुद चलकर इस सरज़मीं पर ना बस जायेगा ??

मंटो के इन्किलाबी फ़साने

हाँ अब्बास, मैं पागल हूँ पागल दीवाना ख़िरद बाख़्ता लोग मुझे दीवाना कहते हैं मालूम है क्यों ?” “इस लिए कि मैं उन्हें ग़रीबों के नंगे बच्चे दिखला दिखला कर ये पूछता हूँ। कि इस बढ़ती हुई ग़ुर्बत का क्या ईलाज हो सकता है? वो मुझे कोई जवाब नहीं दे सकते। इस लिए वो मुझे पागल तसव्वुर करते हैं , वो मुझे पागल कहते हैं वो जिन की नब्ज़-ए-हयात दूसरों के ख़ून की मरहून मिन्नत है, वो जिन का फ़िर्दोस गुरबा के जहन्नम की मुस्तआर ईंटों से उस्तुवार किया गया है, जिन के साज़-ए-इशरत के हर तार के साथ बेवाओं की आहें यतीमों उर्यानी, लावारिस बच्चों की सदा-ए-गिरि या लिपटी हुई है कहीं, मगर एक ज़माना आने वाला है जब यही परवर्दा-ए-ग़ुर्बत अपने दिलों के मुशतर्का लहू में उंगलियां डुबो डुबो कर उन लोगों की पेशानियों पर अपनी लानतें लिखेंगे वो वक़्त नज़दीक है जब अर्ज़ी जन्नत के दरवाज़े हर शख़्स के लिए वाहोंगे। क्या यही इंसानियत है कि मैं अपनी निकम्मी से निकम्मी ख़्वाहिश पर बे-दरेग़ रुपया बहा कर अपना दिल ख़ुश करता हूँ, और मेरे मज़दूरों को एक वक़्त की रोटी नसीब नहीं होती। न के बच्चे मिट्टी के एक खिलौने के लिए तरसते हैं फिर लुत्फ़...