मंटो के इन्किलाबी फ़साने
हाँ अब्बास, मैं पागल हूँ पागल दीवाना ख़िरद बाख़्ता लोग मुझे दीवाना कहते हैं मालूम है क्यों ?” “इस लिए कि मैं उन्हें ग़रीबों के नंगे बच्चे दिखला दिखला कर ये पूछता हूँ। कि इस बढ़ती हुई ग़ुर्बत का क्या ईलाज हो सकता है? वो मुझे कोई जवाब नहीं दे सकते। इस लिए वो मुझे पागल तसव्वुर करते हैं , वो मुझे पागल कहते हैं वो जिन की नब्ज़-ए-हयात दूसरों के ख़ून की मरहून मिन्नत है, वो जिन का फ़िर्दोस गुरबा के जहन्नम की मुस्तआर ईंटों से उस्तुवार किया गया है, जिन के साज़-ए-इशरत के हर तार के साथ बेवाओं की आहें यतीमों उर्यानी, लावारिस बच्चों की सदा-ए-गिरि या लिपटी हुई है कहीं, मगर एक ज़माना आने वाला है जब यही परवर्दा-ए-ग़ुर्बत अपने दिलों के मुशतर्का लहू में उंगलियां डुबो डुबो कर उन लोगों की पेशानियों पर अपनी लानतें लिखेंगे वो वक़्त नज़दीक है जब अर्ज़ी जन्नत के दरवाज़े हर शख़्स के लिए वाहोंगे। क्या यही इंसानियत है कि मैं अपनी निकम्मी से निकम्मी ख़्वाहिश पर बे-दरेग़ रुपया बहा कर अपना दिल ख़ुश करता हूँ, और मेरे मज़दूरों को एक वक़्त की रोटी नसीब नहीं होती। न के बच्चे मिट्टी के एक खिलौने के लिए तरसते हैं फिर लुत्फ़...