मंटो के इन्किलाबी फ़साने

हाँ अब्बास, मैं पागल हूँ पागल दीवाना ख़िरद बाख़्ता लोग मुझे दीवाना कहते हैं मालूम है क्यों?”
“इस लिए कि मैं उन्हें ग़रीबों के नंगे बच्चे दिखला दिखला कर ये पूछता हूँ। कि इस बढ़ती हुई ग़ुर्बत का क्या ईलाज हो सकता है?
वो मुझे कोई जवाब नहीं दे सकते। इस लिए वो मुझे पागल तसव्वुर करते हैं ,
वो मुझे पागल कहते हैं वो जिन की नब्ज़-ए-हयात दूसरों के ख़ून की मरहून मिन्नत है, वो जिन का फ़िर्दोस गुरबा के जहन्नम की मुस्तआर ईंटों से उस्तुवार किया गया है, जिन के साज़-ए-इशरत के हर तार के साथ बेवाओं की आहें यतीमों उर्यानी, लावारिस बच्चों की सदा-ए-गिरिया लिपटी हुई है कहीं, मगर एक ज़माना आने वाला है जब यही परवर्दा-ए-ग़ुर्बत अपने दिलों के मुशतर्का लहू में उंगलियां डुबो डुबो कर उन लोगों की पेशानियों पर अपनी लानतें लिखेंगे वो वक़्त नज़दीक है जब अर्ज़ी जन्नत के दरवाज़े हर शख़्स के लिए वाहोंगे।
क्या यही इंसानियत है कि मैं अपनी निकम्मी से निकम्मी ख़्वाहिश पर बे-दरेग़ रुपया बहा कर अपना दिल ख़ुश करता हूँ, और मेरे मज़दूरों को एक वक़्त की रोटी नसीब नहीं होती।के बच्चे मिट्टी के एक खिलौने के लिए तरसते हैं फिर लुत्फ़ ये है कि मैं मुहज़्ज़ब हूँ, क्या ये दोनों ज़ालिम-ओ-मज़लूम अपने फ़राइज़ से ना-आश्ना नहीं हैं? मैं इन दोनों को उन के फ़राइज़ से आगाह करना चाहता हूँ।

मैं अपना पैग़ाम कहाँ से शुरू करूं ये मुझे मालूम नहीं लेकिन मर्मरीं महल्लात के मकीनो! तुम इस वसीअ कायनात में सिर्फ़ सूरज की रोशनी देखते हो। मगर यक़ीन जानो। इस के साय भी होते हैं तुम मुझे सलीम के नाम से जानते हो, ये ग़लती है मैं वो कपकपी हूँ जो एक कुंवारी लड़की के जिस्म पर तारी होती है। जब वो ग़ुर्बत से तंग आकर पहली दफ़ा एवान-ए-गुनाह की तरफ़ दम बढ़ाने लगे आओ हम सब काँपें!
अगर तुम्हारे बूट ग़रीब मज़दूरों के नंगे सीनों पर ठोकरें लगाते हैं।अगर तुम्हारी ग़फ़लत से हज़ार-हा यतीम बच्चे गहवारा-ए-जहालत में पल कर जेलों को आबाद करते हैं।
ऐसे बहुत से लोग हैं। जो कब्र-नुमा झोनपड़ों में ज़िंदगी के सांस पूरे कर रहे हैं। तुम्हारी नज़रों के सामने ऐसे अफ़राद मौजूद हैं। जो मौत के मुँह में जी रहे हैं।
तुम गुरबा के ग़ैर मुख़्ततिम मसाइब पर हंसते हो। मगर तुम्हें ये मालूम नहीं। कि अगर दरख़्त का निचला हिस्सा लागर मुर्दा हो रहा है तो किसी रोज़ वो बालाई हिस्से के बोझ को बर्दाश्त करते हुए गिर पड़ेगा।”
उसे पागलख़ाने में दाख़िल कर लिया गया है।
२४ मार्च १९३५-ई-
इशाअत-ए-अव्वलीं, अलीगढ़ मैगज़ीन
                                                                                  - सआदत हसन मंटो

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